नई दिल्ली ,25 जनवरी । चंद्रमा और सूर्य पर सफलता का परचम लहराने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ढ्ढस्क्रह्र) अब अंतरिक्ष में भारत का अपना ठिकाना बनाने की तैयारी में जुट गया है। भारत सरकार के स्वदेशी मिशन के तहत इसरो ने ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशनÓ (क्च्रस्) के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। 140 करोड़ भारतीयों के इस सपने की पहली ईंट 2028 में रखी जाएगी, जब स्टेशन का पहला मॉड्यूल (क्च्रस्-01) अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। हालांकि, इस स्टेशन को पूरी तरह काम करने लायक और विकसित होने में करीब 10 साल का समय लगेगा और यह 2035 तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
निजी कंपनियों को मिला इतिहास बनाने का मौका
इस महात्वाकांक्षी परियोजना को गति देने के लिए विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (ङ्कस्स्ष्ट) ने भारतीय निजी कंपनियों से मदद मांगी है। इसरो ने क्च्रस्-01 मॉड्यूल के निर्माण के लिए कंपनियों से ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्टÓ (श्वशढ्ढ) आमंत्रित किया है। इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के लिए कंपनियों के सामने कुछ सख्त शर्तें भी रखी गई हैं। केवल वही कंपनियां आवेदन कर सकती हैं जिनके पास एयरोस्पेस निर्माण में कम से कम 5 साल का अनुभव हो और पिछले तीन वर्षों में उनका औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम 50 करोड़ रुपये रहा हो। आवेदन करने की अंतिम तारीख 8 मार्च 2026 तय की गई है।
धरती से 450 किमी ऊपर रहेगी 4 यात्रियों की टीम
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को पूरी तरह स्वदेशी संसाधनों और तकनीक से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ढ्ढस्स्) की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। योजना के मुताबिक, यह स्टेशन धरती की निचली कक्षा से लगभग 400 से 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित होगा। शुरुआती दौर में इसमें 3 से 4 अंतरिक्ष यात्रियों के ठहरने की क्षमता होगी। इसरो की योजना कुल 5 मॉड्यूल जोड़ने की है, जिसके बाद यह स्टेशन पूरी तरह से काम करना शुरू कर देगा। यह प्रोजेक्ट केवल एक स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के गगनयान मिशन का अगला और विस्तारित चरण है।
मजबूत एल्यूमिनियम से बनेगा ढांचा, सुरक्षा पहली प्राथमिकता
क्च्रस्-01 मॉड्यूल की संरचना बेहद आधुनिक और मजबूत होगी। प्रत्येक मॉड्यूल का व्यास लगभग 3.8 मीटर और लंबाई करीब 8 मीटर होगी। इसे हाई-पावर्ड एल्यूमिनियम एलॉय (्र्र-2219) से तैयार किया जाएगा। यह वही धातु है जिसे मानवयुक्त मिशनों के लिए सुरक्षित माना जाता है। चूंकि भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष यात्री इन्हीं मॉड्यूल्स के भीतर रहकर काम करेंगे, इसलिए सुरक्षा और गुणवत्ता में रत्ती भर भी चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसरो ने साफ किया है कि इसमें मामूली त्रुटि भी स्वीकार्य नहीं होगी।
कड़े टेस्ट से गुजरेगा देसी स्पेस स्टेशन
अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसरो ने एक विशेष योजना बनाई है। इसके तहत धरती पर मॉड्यूल के दो पूर्ण सेट तैयार किए जाएंगे। इनमें से सर्वश्रेष्ठ हार्डवेयर का चयन कड़े परीक्षणों के बाद ही अंतरिक्ष में भेजने के लिए किया जाएगा। इन मॉड्यूल्स को प्रेशर टेस्ट, लीक टेस्ट और नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग जैसी जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसरो का मानना है कि यह स्टेशन देश के वैज्ञानिक भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यहां माइक्रोग्रैविटी में लंबे समय तक प्रयोग किए जा सकेंगे और मानव शरीर पर अंतरिक्ष के प्रभावों का अध्ययन कर भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों की राह आसान की जाएगी।
