मुंबई ,28 जनवरी । महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार का सफर आज थम गया। वह शख्स, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसे कभी सत्ता से बाहर नहीं रखा जा सकता, आज नियति के आगे हार गया। बुधवार को बारामती में हुए विमान हादसे में अजित पवार गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें तुरंत स्थानीय मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। इस दर्दनाक हादसे में अजित पवार, उनके पीएसओ और दो क्रू मेंबर्स समेत कुल 5 लोगों की मौत हुई है।
अस्पताल में ली आखिरी सांस, अपने ही गढ़ में हुआ हादसा
यह हादसा अजित पवार के राजनीतिक गढ़ बारामती में हुआ, जहां से उनका रिश्ता बेहद गहरा था। लैंडिंग के दौरान विमान क्रैश होने के बाद उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया था, लेकिन उनकी चोटें जानलेवा साबित हुईं। अजित पवार इसी सीट से विधायक थे और हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने भतीजे युगेंद्र पवार को हराकर यहां से अपनी बादशाहत कायम रखी थी। अपने ही घर में हुए इस हादसे ने उनके समर्थकों और चाहने वालों को गहरा सदमा दिया है।
सत्ता के केंद्र में रहे, लेकिन सीएम की कुर्सी रही दूर
अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति के उन चुनिंदा चेहरों में से थे, जिनका रसूख सरकार बदलने के बाद भी कभी कम नहीं हुआ। उन्हें राजनीति का ऐसा खिलाड़ी माना जाता था जो हमेशा सत्ता के केंद्र में रहा। उन्होंने 6 बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया, लेकिन नियति का खेल देखिए कि सत्ता की चाबी पास होने के बावजूद ‘मुख्यमंत्रीÓ की कुर्सी उनसे हमेशा एक कदम दूर ही रही। विलासराव देशमुख से लेकर पृथ्वीराज चव्हाण और हालिया सरकारों तक, अजित पवार ने सिंचाई, ग्रामीण विकास और जल संसाधन जैसे भारी-भरकम मंत्रालय संभाले और प्रशासन पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।
कोऑपरेटिव से शुरू हुआ था सफर
22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित पवार को राजनीति विरासत में मिली थी, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान अपने काम से बनाई। महज 23 साल की उम्र में वे कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में शामिल हुए। इसके बाद सहकारिता क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत होती गई। 1991 में वे पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने और 16 साल तक इस पद पर रहे। 1991 में ही वे बारामती से सांसद चुने गए, लेकिन राज्य की राजनीति उन्हें ज्यादा रास आई। 1995 से उन्होंने विधानसभा का जो सफर शुरू किया, वह लगातार जारी रहा। 2024 तक वे लगातार सात बार विधायक चुने गए। आज उनके निधन से महाराष्ट्र की राजनीति के एक प्रमुख अध्याय का अंत हो गया है।

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