नई दिल्ली ,25 जनवरी । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज से जुड़ी एक अपील पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन (साथ रहने) की अवधारणा के प्रभाव में शादी किए बिना साथ रहने वाले युवाओं की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। ऐसे रिश्ते फेल होने पर अक्सर दर्ज कर दी जाती है और कानून महिलाओं के पक्ष में होने के कारण पुरुषों को उन धाराओं के तहत दोषी ठहराया जाता है, जो उस समय बनाए गए थे जब लिव-इन का कॉन्सेप्ट मौजूद नहीं था।
हाईकोर्ट ने इस तर्क के आधार पर अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की बेंच ने दिया है।
यह पूरा मामला वर्ष 2021 का है। मार्च 2024 में महाराजगंज की  कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने चंद्रेश को आईपीसी,  एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए अलग-अलग मामलों में 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई थी। अप्रैल 2024 में चंद्रेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी।
आरोप था कि चंद्रेश ने शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। नाबालिग लड़की 6 अगस्त 2021 को अपने घर लौट आई और उसने बताया कि चंद्रेश ने उसे शादी करने का वादा किया था, लेकिन बाद में शादी नहीं की। लड़की के पिता ने दावा किया कि उनकी बेटी नाबालिग है और उसके आधार कार्ड के अनुसार जन्मतिथि 1 मार्च 2003 है।

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