अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर विवाद तेज है। सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो संज्ञान लेते हुए सोमवार को सुनवाई तय की है। दूसरी ओर इसी मामले में गंभीर आरोप कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर तीखे सवाल भी पूछे हैं। दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर देश में चल रहे विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में सुओ मोटो संज्ञान लेते हुए सोमवार को सुनवाई तय की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन न्यायाधीशों की बेंच इस अहम पर्यावरणीय मुद्दे पर विचार करेगी, जिससे अरावली के संरक्षण और खनन नीति की दिशा तय हो सकती है।ये पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने बीते 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों की एक एक समान (यूनिफॉर्म) परिभाषा को मंजूरी दी थी। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया था कि दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज तब तक नहीं दी जाएगी, जब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट नहीं आ जाती। कोर्ट ने यह फैसला पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया।सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजूर समिति की सिफारिशों के अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भूमि होगी जिसकी ऊंचाई अपने आसपास के इलाके से 100 मीटर या उससे अधिक हो, जबकि अगर दो या उससे ज्यादा ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के भीतर हों तो उन्हें अरावली रेंज माना जाएगा। इस परिभाषा में पहाड़ियों के साथ उनकी ढलान, आसपास की जमीन और जुड़े भू-आकार भी शामिल होंगे।इस फैसले के बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि नई परिभाषा से अरावली पहाड़ियों का बंटवारा होगा और उनकी भौगोलिक व पर्यावरणीय पहचान कमजोर हो जाएगी।पत्र में जयराम रमेश ने केंद्रीय मंत्री से चार बड़े सवाल पूछे है। उन्होंने पूछा कि क्या यह सच नहीं है कि 2012 से राजस्थान में अरावली की परिभाषा फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की 2010 की रिपोर्ट के आधार पर तय थी, जिसमें 3 डिग्री या ज्यादा ढलान वाले इलाके भी पहाड़ी माने जाते थे? उन्होंने पूछा कि क्या यह सही नहीं है कि FSI ने 2025 में कहा था कि 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां भी रेत के तूफानों को रोकने में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं?

जयराम रमेश ने तीसरा सवाल पूछा कि क्या यह सच नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने 2025 में कहा था कि राजस्थान में 164 खनन लीज अरावली क्षेत्र के अंदर आती हैं? इसके साथ ही 
उन्होंने पूछा कि क्या नई परिभाषा से छोटी पहाड़ियाँ और टीले अरावली से बाहर हो जाएंगे, जिससे पूरी पर्वत श्रृंखला की पर्यावरणीय सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी?इसके साथ ही कांग्रेस का कहना है कि नई परिभाषा से 90% से ज्यादा अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा, जिससे वहां खनन और निर्माण का रास्ता खुल सकता है। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। बताते चले कि खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार कोर और संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। जब तक सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान (एमपीएसएम) तैयार नहीं हो जाता, नई खनन लीज नहीं दी जाएगी। जो खदानें पहले से चल रही हैं, वे कड़ी शर्तों के साथ चल सकेंगी। इसके साथ ही पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण इलाकों की पहचान कर वहां खनन पर रोक लगेगी। 

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