हरिद्वार। संस्कृति एवं संस्कार जीवन मे अनुशासन,नैतिकता और संतुलन स्थापित करने के आधारभूत स्तम्भ है। इनसे वंचित व्यक्ति का जीवन निरर्थक एवं निष्प्रयोज्य है। वर्तमान परिवेश मे संस्कृति की रक्षा एवं संस्कारों का संवर्धन करने मे संस्कृत एवं शारीरिक शिक्षा बेहतर मानक सिद्ध हो सकती है।गुरुकुल कांगडी समविश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा.शिवकुमार चौहान ने शारीरिक शिक्षा के प्रशिक्षुओं से संवाद करते हुए यह बात कही।डा.शिवकुमार चौहान ने कहा कि संस्कार किसी भी व्यक्ति के आचार-विचार को परिष्कृत करके कर्तव्यपरायण बनाते है।जबकि संस्कृति नैतिक मूल्यों और सामाजिक दायित्वों के माध्यम से अनुशासित जीवन यापन करना सीखाती है।जिससे चरित्र-निर्माण,ईमानदारी,सहनशीलता के साथ आगे बढने की प्रेरणा एवं जीवन मे सफलता अर्जित की जा सकती है।डॉ.चौहान ने कहा कि सामान्य जीवन मे नैतिकता तथा शिक्षक के रूप मे प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ खुद के व्यक्तित्व मे चरित्र -निर्माण,ईमानदारी,सहनशीलता जैसे महत्वपूर्ण गुणों के बल पर एक मॉडल शारीरिक शिक्षक बना जा सकता है।जो अन्य सभी के लिए प्रेरणा बन सकता है।एक श्रेष्ठ शारीरिक शिक्षक के गुणों पर चर्चा करते हुये कहा कि मूल्यों का समावेश संस्कार ईमानदारी,विनयशीलता और आदर जैसे गुण विकसित करते हैं,जो स्वतःही अनुशासित व्यवहार को जन्म देते हैं। कर्तव्यबोध.संस्कृति व्यक्ति को अपने सामाजिक,पारिवारिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति सजग करती है,जो अनुशासन का सर्वाेच्च रूप है।चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण संस्कार मन को निर्मल और संतुलित बनाकर चरित्र को सुदृढ़ करते हैं,जिससे व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अनुशासित रहता है।समय का सदुपयोग.अच्छे संस्कार समय का मूल्य समझाते हैं,जो उत्पादकता और सफलता के लिए आवश्यक अनुशासित दिनचर्या का आधार है।पीढ़ियों का जुड़ाव.हमारी संस्कृति हमें बड़ों का सम्मान और परंपराओं का पालन सिखाती है,जो जीवन में एक मर्यादित अनुशासन बनाए रखने में मदद करता है। डा.चौहान ने सार रूप मे कहा कि सामान्य संस्कार व्यक्ति को आंतरिक रूप से अनुशासित करते हैं और संस्कृति बाहरी आचरण में शिष्टाचार लाती है।जो जीवन को सार्थक,उद्देश्यपूर्ण और व्यवस्थित बनाने की एक प्रक्रिया है। संवाद मे भाग लेने वाले प्रशिक्षुओं मे अनिकेत कौशिक,निखिल प्रजापति,रजत ओरान, अनशुमान बिश्नोई,उदित कुमार आदि उपस्थित रहे।

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