–सहारनपुर की 19 सरकारी गोशालाओं से अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवारों को गाय का उपलब्ध कराने की योजना बेअसर
–चार साल के आंकड़े खोल रहे व्यवस्था की पोल
अभिमन्यु वालिया
सहारनपुर। जिले में अत्यंत कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई दुधारू गाय उपलब्ध कराने की योजना अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है। सरकारी गोशालाओं में दुधारू
गायों की कमी और योजना के क्रियान्वयन में सामने आ रही समस्याओं के कारण जरूरतमंद परिवारों तक इसका लाभ पहुंचाने की चुनौती बनी हुई है। जिले की 19 सरकारी गोशालाओं में लगभग 4456 गोवंश होने के बावजूद दुग्धारू गायों की संख्या महज छह बताई गई है। वहीं, जिले में 4856 बच्चे अत्यंत कुपोषित श्रेणी में दर्ज किए गए हैं।
दरअसल, योजना का उद्देश्य अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवारों को दुधारू गाय उपलब्ध कराना है। ताकि बच्चों को नियमित रूप से दूध मिल सके और उनके पोषण स्तर में सुधार लाया जा सके। इसके लिए पशुपालन विभाग की ओर से प्रयास किए जाते हैं। हालांकि, गोशालाओं में पर्याप्त संख्या में दुधारू गाय उपलब्ध नहीं होने से योजना की उपयोगिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जरूरतमंद परिवारों तक लाभ पहुंचाने के लिए गायों की उपलब्धता, उनके चयन और वितरण की व्यवस्था को प्रभावी बनाना जरूरी है।
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19 गोशालाओं में गोवंश अधिक, दूध देने वाली गायें कम
सहारनपुर। जिले की 19 सरकारी गोशालाओं में करीब 4456 गोवंश संरक्षित हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऐसे गोवंश शामिल हैं, जो दूध नहीं देते। आंकड़ों के अनुसार, इन गोशालाओं में दुधारू गायों की संख्या केवल छह है। ऐसे में अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवारों को गाय उपलब्ध कराने की योजना के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां खड़ी हो रही हैं।
योजना के तहत परिवार को दुधारू गाय मिलने पर बच्चे को नियमित रूप से दूध उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। खासकर उन परिवारों के लिए यह उपयोगी हो सकता है, जिनके पास बच्चों के पोषण के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, लेकिन गायों की सीमित उपलब्धता के चलते जरूरतमंद परिवारों की संख्या और उपलब्ध पशुओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।गोशालाओं में संरक्षित गोवंश की संख्या अधिक होना अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि वहां से बच्चों के परिवारों को दूध देने वाली गाय उपलब्ध कराई जा सकेगी। इसके लिए दुग्ध उत्पादन की क्षमता, गायों के स्वास्थ्य और वितरण संबंधी मानकों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
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चार साल के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव
सहारनपुर। जिले में कुपोषित और अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या को लेकर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि समस्या लगातार बनी हुई है। वर्ष 2023 से 2026 तक के आंकड़ों में दोनों श्रेणियों में बदलाव देखने को मिला है। अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या में कुछ वर्षों में वृद्धि और कुछ में कमी दर्ज की गई।
वर्ष 2023 में जिले में 21,254 बच्चे कुपोषित श्रेणी में दर्ज थे, जबकि अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या 1,722 थी। वर्ष 2024 में कुपोषित बच्चों की संख्या घटकर 14,532 रह गई, लेकिन अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़कर 3,876 हो गई। वर्ष 2025 में कुपोषित बच्चों की संख्या 17,896 दर्ज की गई। इस साल अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़कर 4856 तक पहुंच गई।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुपोषण की समस्या पर लगातार निगरानी और प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है। हालांकि, अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों की सही तुलना के लिए सर्वेक्षण, पहचान और रिपोर्टिंग की पद्धति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
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योजना का लाभ जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाना चुनौती
सहारनपुर। अत्यंत कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जाते हैं। इनमें बच्चों की पहचान, स्वास्थ्य जांच, पोषण संबंधी परामर्श, नियमित निगरानी और जरूरत के अनुसार उपचार शामिल हैं। दुगधारू गाय उपलब्ध कराने की योजना भी इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य परिवारों को दूध जैसा पोषक खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने में मदद करना है।लेकिन योजना की सफलता केवल इसे शुरू करने या पात्र परिवारों की सूची तैयार करने से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि वास्तव में कितने परिवारों को गाय उपलब्ध कराई गई, कितने परिवारों को नियमित दूध मिल रहा है और बच्चों के पोषण स्तर में कितना सुधार हुआ है। यदि गोशालाओं में दुधारू गायों की उपलब्धता सीमित है, तो संबंधित विभागों को वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार करना होगा। पात्र परिवारों तक पोषण सहायता पहुंचाने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग और पशुपालन विभाग के बीच बेहतर समन्वय उपयोगी साबित हो सकता है।
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पशुपालन विभाग के सामने दुधारू गायों की उपलब्धता का सवाल
सहारनपुर। विभागीय जानकारी के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में गोशालाओं से केवल 15 दुग्धारू गायें उपलब्ध हो सकीं। चालू वर्ष में भी दुग्धारू गायों की उपलब्धता सीमित रही। उपलब्ध छह गायों में से दो गायों को पशुपालन विभाग की ओर से परिवारों को दिए जाने का उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि योजना के लिए पर्याप्त संख्या में दुग्धारू गाय उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है।
दूसरी ओर, नगर निगम की 18 गोशालाओं में दुगधारू गाय नहीं होने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि गोशालाओं में मौजूद हजारों गोवंश के बीच दूध देने वाली गायों की संख्या इतनी कम क्यों है और योजना के लिए अतिरिक्त गायों की व्यवस्था कैसे की जाएगी।
इस स्थिति में विभाग के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर गोशालाओं में संरक्षित गोवंश की देखभाल करनी है, वहीं दूसरी ओर पात्र परिवारों को योजना का लाभ उपलब्ध कराना है। इसके लिए उपलब्ध गायों का सत्यापन, उनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता का आकलन और जरूरतमंद परिवारों की प्राथमिकता के आधार पर चयन महत्वपूर्ण होगा।
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सिर्फ गाय देना काफी नहीं, बच्चों के स्वास्थ्य की निगरानी भी जरूरी
सहारनपुर। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यंत कुपोषित बच्चों की देखभाल में केवल दूध उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। बच्चों की उम्र, वजन, लंबाई, स्वास्थ्य की स्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों के आधार पर देखभाल की जानी चाहिए। अत्यंत कुपोषित बच्चों को कई बार चिकित्सकीय जांच और विशेष पोषण उपचार की आवश्यकता होती है।
दुधारू गाय मिलने से परिवार को दूध की उपलब्धता में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका लाभ तभी प्रभावी होगा जब बच्चे को उसकी जरूरत के अनुसार संतुलित आहार और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं भी मिलें। इसलिए योजना के साथ बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच और पोषण स्तर की निगरानी को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा, परिवार को गाय की देखभाल, चारे, पानी, पशु चिकित्सा और दूध की स्वच्छता संबंधी जानकारी देना भी जरूरी है। यदि इन व्यवस्थाओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो योजना का अपेक्षित लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है।
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पात्र परिवारों की सूची और परिणामों की समीक्षा जरूरी
सहारनपुर। योजना की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए यह जानकारी सामने आनी चाहिए कि जिले में कितने अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवार पात्र पाए गए हैं, कितने परिवारों को दुधारू गाय दी गई और कितने परिवार अब भी लाभ की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसके साथ ही गाय मिलने के बाद बच्चों के वजन और पोषण स्तर में हुए बदलाव का रिकॉर्ड भी रखा जाना चाहिए। यदि किसी परिवार को गाय उपलब्ध कराना संभव नहीं है तो उसके बच्चे को अन्य माध्यमों से पर्याप्त पोषण सहायता दिलाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे योजना का लाभ केवल पशु वितरण तक सीमित रहने के बजाय बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के उद्देश्य से जुड़ सकेगा सहारनपुर में अत्यंत कुपोषित बच्चों की संख्या और गोशालाओं में दुधारू गायों की सीमित उपलब्धता के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है। विभागीय आंकड़ों की नियमित समीक्षा, पात्र परिवारों तक सहायता पहुंचाने और बच्चों के स्वास्थ्य परिणामों की निगरानी से ही योजना की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सकता है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग दुधारू गायों की कमी दूर करने और अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवारों तक योजना का लाभ पहुंचाने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
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4456 गोवंश, दधारू गाय सिर्फ छह
– जिले में सरकारी गोशालाओं की संख्या: 19
– गोशालाओं में संरक्षित गोवंश: करीब 4456
– उपलब्ध दुधारू गाय: छह
– पिछले तीन वर्षों में उपलब्ध हुई दुग्धारू गाय: 15
– नगर निगम की गोशालाएं: 18, जहां दुधारू गाय नहीं होने की जानकारी है।
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योजना की सफलता के लिए क्या जरूरी?
– पात्र परिवारों की पारदर्शी सूची तैयार हो।
– दुधारू गायों की उपलब्धता बढ़ाने के विकल्प तलाशे जाएं।
– गाय पाने वाले परिवारों की नियमित निगरानी हो।
– बच्चों के वजन, लंबाई और पोषण स्तर का रिकॉर्ड रखा जाए।
– अत्यंत कुपोषित बच्चों को जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय देखभाल मिले।
– गाय उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में परिवारों को वैकल्पिक पोषण सहायता दी जाए।
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बड़ा सवाल…
सहारनपुर। जब गोशालाओं में हजारों गोवंश मौजूद हैं तो अत्यंत कुपोषित बच्चों के परिवारों के लिए पर्याप्त दुधारू गायों की व्यवस्था कैसे होगी?
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चार साल में कुपोषण के आंकड़े
वर्ष—- अत्यंत कुपोषित बच्चे |
2023—– 1722
2024——3876
2025—– 4454
2026—– 4856

