हरिद्वार। पंचायती श्रीनिरंजनी अखाड़ा में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राज राजेश्वराश्रम महाराज की अध्यक्षता में जापान के बालाकुंभगुरु मुनि का महामंडलेश्वर पद पर पट्टाभिषेक वैदिक रीति से सम्पन्न हुआ।यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा,बल्कि विश्व पटल पर सनातन धर्म की बढ़ती चेतना का जीवंत संदेश भी बनकर उभरा।संत समाज की उपस्थिति में वैदिक संन्यास संस्कार संपन्न हुआ।समारोह का संचालन अखाड़ा परिषद,मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं पंचायती श्रीनिरंजनी अखाड़ा के सचिव श्रीमहंत रविंद्र पुरी महाराज ने संत परंपरा और दिव्यता के साथ किया।संन्यास परंपरा के अनुसार सबसे पहले बालाकुंभ गुरु मुनि के कानों से कुंडल उतारे गए।इसके बाद उन्हें वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संन्यास दीक्षा प्रदान की गई।जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राज राजेश्वराश्रम महाराज ने उनके कान में गुरु मंत्र फूँका,और उन्हें संन्यास परंपरा से जोड़ते हुए दिव्य दीक्षा प्रदान की।फिर पुष्पों और वैदिक स्तोत्रों से उनका अभिषेक कराया गया,जो एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण का संचार कर गया।संतों ने सनातन धर्म की मजबूती पर जोर दिया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी महामंडलेश्वर,महंतों व संतों ने अपने विचार व्यक्त किए। महामंडलेश्वर ललितानंद गिरी ने आध्यात्मिक उद्बोधन देते हुए सनातन परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डाला।पंचायती श्रीनिरंजनी अखाड़ा के सचिव महंत राम रतन गिरी ने सभी का आभार व्यक्त किया।अध्यक्षीय संबोधन में जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने अत्यंत प्रभावशाली ,चिंतनशील और चेतावनी से भरा हुआ उद्बोधन दिया।उन्होंने कहा,“जब भगवान ने सृष्टि की रचना की,उसी क्षण सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई।दुनिया में राष्ट्र इस्लामिक होते जा रहे हैं,परंतु सनातन लगातार घट रहा है,यह चिंता का विषय है।उन्होंने कहा कि“यदि परिवार एक ही संतान पैदा करेगा,तो भविष्य में संत कौन बनेगा?यह सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।उनके उद्बोधन ने पूरे पंडाल में मौजूद साधु-संतों को चिंतन करने पर मजबूर कर दिया।जगद्गुरु ने भविष्य में सनातन संरक्षण के लिए समाज को जागरूक होने का संदेश दिया।हरिद्वार में सनातन का वैश्विक उत्थान जापान से आए साधु का महामंडलेश्वर बनना इतिहास,जापान से आए बाला कुंभ गुरु मुनि का महामंडलेश्वर बनना न केवल अखाड़ों के लिए गौरव का विषय है,बल्कि इस बात का प्रतीक भी है कि सनातन धर्म विश्व को आकर्षित कर रहा है और इसका प्रभाव सीमाओं से परे बढ़ रहा है।हरिद्वार की पवित्र भूमि पर सम्पन्न हुआ यह समारोह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है।यह न केवल सनातन धर्म की आभा का विस्तार है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरक संदेश भी है कि सनातन धर्म को बचाने,समझने और प्रसारित करने का समय अब आ चुका है।

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