–भारतीय संस्कृति और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं का अनूठा संगम, वृंदावन के कलाकार चौपाइयों में करते हैं रामायण का मंचन

अभिमन्यु वालिया
सहारनपुर।भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपराओं को जीवंत रखने में सहारनपुर की प्राचीन श्रीरामलीला कमेटी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। जिले की यह ऐतिहासिक रामलीला कमेटी 150 वर्षों से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लीलाओं का मंचन भारतीय संस्कृति के अनुरूप कराती आ रही है। खास बात यह है कि देश में बनारस के बाद सहारनपुर में श्रीराम का भव्य मढ़ा किए जाने की परंपरा को विशेष पहचान प्राप्त है। यहां रामलीला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार और सामाजिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम भी है।
प्राचीन रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित होने वाले दशहरा महोत्सव में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का मंचन किया जाता है। रामायण की चौपाइयों के माध्यम से प्रस्तुत की जाने वाली लीलाएं दर्शकों को त्रेतायुग की घटनाओं से परिचित कराती हैं। कमेटी का प्रयास है कि आधुनिकता के दौर में भी भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का मूल स्वरूप सुरक्षित बना रहे।
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वृंदावन के कलाकार चौपाइयों के साथ करते है मंचन
सहारनपुर। प्राचीन रामलीला कमेटी की विशेषता यह है कि भगवान श्रीराम की लीलाओं का मंचन वृंदावन से आने वाले अनुभवी कलाकार करते हैं। ये कलाकार रामायण की चौपाइयों के माध्यम से कथा को मंच पर प्रस्तुत करते हैं। श्रीराम के रूप में कौशल लाल, लक्ष्मण के रूप में प्रतीक, भरत के रूप में शरद गोस्वामी, माता सीता के रूप में हरिओम, हनुमान के रूप में सत्यपाल और रावण के रूप में दीपक अभिनय करते हैं।
कलाकारों को रामायण की चौपाइयां कंठस्थ हैं। संवाद, भाव-भंगिमा और पारंपरिक वेशभूषा के जरिए वे धार्मिक प्रसंगों को प्रभावशाली बनाते हैं। इससे दर्शकों को रामकथा का पारंपरिक स्वरूप देखने को मिलता है। कमेटी की ओर से निर्धारित नियमों के अनुसार लीलाओं का मंचन किया जाता है। इसमें धार्मिक मर्यादा और परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। मंचन के दौरान महिला कलाकारों के स्थान पर पुरुष कलाकार ही विभिन्न महिला पात्रों की भूमिका निभाते हैं।
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सहारनपुर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत रही प्राचीन रामलीला
सहारनपुर। सहारनपुर की प्राचीन रामलीला की सबसे खास पहचान श्रीराम का मढ़ा है। कमेटी की परंपरा के अनुसार, बनारस के बाद सहारनपुर में भगवान श्रीराम का मढ़ा किया जाता है। धार्मिक आस्था से जुड़े इस आयोजन को देखने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। यह परंपरा सहारनपुर की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करती है।
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शहर में भव्य होती है भगवान श्रीराम की बारात
सहारनपुर। प्राचीन रामलीला कमेटी की ओर से भगवान शंकर की बारात और प्रभु श्रीराम की बारात भी धूमधाम से निकाली जाती है। भगवान श्रीराम की बारात में आकर्षक झांकियां, बैंड-बाजे और धार्मिक प्रस्तुतियां श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती हैं। शहर के अलग-अलग बाजारों से गुजरने वाली बारात के दौरान जगह-जगह स्वागत किया जाता है।राम बारात में प्रभु श्रीराम के साथ लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न सहित अन्य पात्रों की झांकियां भी आकर्षण का केंद्र रहती हैं। धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर भगवान श्रीराम के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
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नियमों और मर्यादा के साथ होता है मंचन
सहारनपुर। प्राचीन रामलीला कमेटी का प्रयास रहता है कि रामलीला का मंचन धार्मिक नियमों और भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो। कमेटी के अनुसार, मंचन में मर्यादा और अनुशासन को प्राथमिकता दी जाती है। कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में पात्रों का अभिनय करते हैं और रामायण की चौपाइयों के माध्यम से प्रसंगों को जीवंत बनाते हैं। इसी परंपरा के कारण रामलीला का अपना अलग स्वरूप बना हुआ है।
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वर्षों से संस्कृति की धरोहर को संजो रही कमेटी
सहरानपुर। प्राचीन रामलीला कमेटी वर्षों से इस धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ा रही है। कमेटी के प्रधान विनय जिंदल के अनुसार, यहां भारतीय संस्कृति और निर्धारित नियमों के मुताबिक रामलीला का मंचन कराया जाता है। उनका कहना है कि भगवान श्रीराम सहित सभी पात्रों की लीलाओं को पारंपरिक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। महिला पात्रों का अभिनय भी पुरुष कलाकार करते हैं और मंचन में धार्मिक मर्यादा का पूरा ध्यान रखा जाता है। कमेटी का उद्देश्य केवल आयोजन कराना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्शों, त्याग, सत्य, कर्तव्य और मर्यादा का संदेश देना भी है। यही कारण है कि सहारनपुर की प्राचीन रामलीला आज भी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी हुई है।
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रामलीला में अनुशासन और परंपरा को प्राथमिकता
सहारनपुर। रामलीला भवन में मंचन के दौरान कलाकारों और आयोजकों के लिए निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक माना जाता है। पारंपरिक वेशभूषा, चौपाइयों पर आधारित संवाद और धार्मिक मर्यादा इस आयोजन की प्रमुख विशेषताएं हैं। कमेटी इन परंपराओं के माध्यम से सहारनपुर की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रही है।

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