नई दिल्ली,23 सितंबर । चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से पिछले 10 महीनों में कई फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट के बाद आयोग ने बुधवार को अपना स्पष्टीकरण जारी किया। आयोग ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324, संबंधित कानूनों और स्थापित परंपराओं के तहत काम करने वाली संवैधानिक संस्था है। आयोग के अनुसार, किसी भी संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना बातचीत और विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग ने कहा कि केवल तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देने के लिए अधिकृत है। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले 10 महीनों के दौरान दर्ज किए गए कुछ आंतरिक नोट्स को प्रमुखता देना और इस अवधि में लिए गए फैसलों, जारी आदेशों तथा शुरू की गई पहलों के बड़े समूह को नजरअंदाज करना पूरी तस्वीर सामने नहीं रखता। आयोग के मुताबिक, हाल के महीनों में करीब 40 नई पहल और कई चुनावी सुधार किए गए हैं तथा ये फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग ने कहा कि उसने बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में बड़े चुनावों के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया भी पूरी की। आयोग के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और तकनीकी व्यवस्था के साथ अनेक मंजूरियां तथा निर्देश शामिल थे।
आयोग ने कहा कि वह अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरी गंभीरता से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भूमिका को समझता है। आयोग का यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से आयोग के कुछ फैसलों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता पंजीयन, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, नए मतदाताओं के लिए वैधानिक प्रपत्र-6 में बदलाव तथा मतदाता सूची के आंकड़ों के प्रबंधन जैसे मुद्दों से संबंधित थीं। दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के आंकड़ों के दिल्ली में धीरे-धीरे केंद्रीकरण और राज्यों के अधिकारियों की प्रणाली तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम बहाल करने से संबंधित फैसलों के खिलाफ अपील दायर करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। गोवा में भी कुछ पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाने से जुड़ी तकनीकी समस्या का मुद्दा सामने आया था।
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की व्यवस्था में दो अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है और सवाल किया कि क्या वे केवल देखने के लिए हैं।
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि वह अकेले चुनाव आयोग चला रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि इस मामले में न्याय होना चाहिए।
इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर सहित आयोग के सभी प्रमुख फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से किसी विषय पर चिंता या सुझाव दर्ज किया जाना अंतिम फैसले से असहमति के समान नहीं है।
इस प्रकार एक ओर सामने आई रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कई मामलों में दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है, वहीं चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि इन आंतरिक टिप्पणियों को आयोग के अंतिम फैसलों से अलग करके देखा जाना चाहिए और उसके प्रमुख निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
