नईदिल्ली,02 मई । पश्चिम बंगाल में मतगणना के दौरान केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने कहा कि काउंटिंग टेबल पर केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती नियमों के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने कहा, अगर मतगणना पर्यवेक्षकों और सहायकों को पूरी तरह से केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों से भी लिया जाता है, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता। कानून चुनाव आयोग के ढांचे के तहत राज्य या केंद्र के अधिकारियों में से चयन की अनुमति देता है।
कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई बिना कोई आदेश पारित किए खत्म कर दी। कोर्ट ने केवल चुनाव आयोग की इस बात को दर्ज किया कि मतगणना कर्मचारियों की नियुक्ति संबंधी परिपत्र का अक्षरश: पालन किया जाएगा। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने कहा था कि अब वह केवल यह मांग कर रही है कि परिपत्र के अनुसार हर मतगणना केंद्र पर कम से कम एक व्यक्ति राज्य सरकार का कर्मचारी हो।
टीएमसी का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, पहले से ही केंद्र सरकार का एक नामित सदस्य मौजूद है और अब एक और सदस्य जोड़ा जा रहा है। सर्कुलर में राज्य सरकार के नामित सदस्य की जरूरत बताई गई है लेकिन नियुक्ति नहीं की जा रही। अनुच्छेद 324 का मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग जो मन मे आए करे। ऐसी चीजें पहले नहीं हुईं। चुनाव आयोग को कहां से आशंका हो गई?
सिब्बल ने कहा, 4 मुद्दे हैं। पहला- डीईओ को नोटिस 13 अप्रैल को जारी किया गया, लेकिन हमें जानकारी 29 अप्रैल को मिली। दूसरा- हमें आशंका है कि हर बूथ में गड़बड़ी होने वाली है। तीसरा ये कि हर बैठक में पहले ही एक केंद्रीय अधिकारी मौजूद है, तो अब एक और अधिकारी की क्या जरूरत है? चौथा यह कि परिपत्र में ही कहा गया है कि एक राज्य अधिकारी भी होना चाहिए, लेकिन वे नियुक्त नहीं करते हैं।
कोर्ट ने कहा, मतगणना के लिए तैनात सभी कर्मी चुनाव आयोग के नियंत्रण में हैं, इसलिए यह मायने नहीं रखता कि वे केंद्र से हैं या राज्य से। पार्टियों से परामर्श करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि चुनाव और मतगणना एजेंट मौजूद रहेंगे और प्रत्येक मतगणना केंद्र पर 3 कर्मी होंगे। सरकारी कर्मचारियों से किसी तरह की निष्ठा की अपेक्षा नहीं की जा सकती और वे आधिकारिक कर्तव्य के तहत काम करते हैं।
दरअसल, चुनाव आयोग ने निर्देश दिया था कि हर काउंटिंग टेबल पर कम से कम एक सुपरवाइजर या असिस्टेंट केंद्रीय सरकार या पीएसयू का कर्मचारी होना चाहिए। टीएमसी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि यह बिना पर्याप्त अधिकार के लिया गया है और दूसरे राज्यों में ऐसा नियम लागू नहीं किया गया। इस मामले में पहले टीएमसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था, जहां हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया था।

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