हरिद्वार। कभी जिन नन्हें हाथों को थामकर दुनिया में चलना सिखाया, दुध पिलाकर पाला पोसा, इंसान बनाने के लिए हर संभव कार्य किया, लेकिन शायद परवरिश में कमी रही या बदलते दौर का प्रभाव पड़ा, आज उन्हीं हाथों ने अपनी उस मां को न केवल घर से बाहर निकाल फेंका, बल्कि दर दर भटकने को मजबूर कर दिया। हरिद्वार के कनखल क्षेत्र के हिमगिरि विहार,विष्णु गार्डन में रहने वाली 64 वर्षीय विधवा महेंद्र कौर के साथ घटी यह घटना समाज के नैतिक पतन को उजागर करती है। आरोप है कि पीड़िता जब कनखल पुलिस के पास गई तो पुलिस ने कार्यवाही करने के बजाए घर का मामला बता कर वापस भेज दिया। महेंद्र कौर के जीवन में कठिनाइयाँ मई 2023में शुरू हुईं,जब उनके पति श्री गायत्री प्रसाद का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। अपने पति की विरासत को सुरक्षित रखने की चाह में उन्होंने और अन्य उाराधिकारियों ने हरिद्वार गैस एजेंसी (इंडेन) का स्वामित्व अपने बेटे प्रियंक कुमार को सौंप दिया।लेकिन यह सौंपने की प्रक्रिया मानो उनके लिए बर्बादी की दस्तक थी। बेटे और बहू का व्यवहार धीरे-धीरे कठोर होता गया। स्थानीय निवासियों के अनुसार, प्रियंक कुमार और उसकी पत्नी अनन्या असर महेंद्र कौर के साथ अपमानजनक भाषा में बात करते थे।घर में अपशदों और तानों का माहौल आम हो गया था। बेटे-बहू ने न केवल मानसिक यातनाएं दीं, बल्कि खुले शदों में यह तक कह दिया कि यह घर और इसमें रखा हर सामान सिर्फ उनका है, और इसमें उनकी कोई जगह नहीं। यह वही घर था जिसे उन्होंने और उनके दिवंगत पति ने मेहनत और संघर्ष से बनाया था, लेकिन अब उन्हें उसी घर से बेदखल कर दिया गया है। गौरतलब है कि अब, इस कोठी;मकानद्ध की कीमत 10 करोड़ रूपये से भी अधिक है। लेकिन प्रियंक और उसकी पत्नी अनन्या इसे पारिवारिक मामला बताकर चुप्पी साधे हुए हैं।
सभी को ज्ञात हो की वरिष्ठ नागरिक संरक्षण अधिनियम 2007 के तहत माता-पिता को भरण-पोषण और देखभाल का अधिकार प्राप्त है। यदि संतान माता-पिता को प्रताड़ित करती है या घर से बाहर निकालती है,तो उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी कानून का सहारा मिला,लेकिन शायद अधूरा। दरअसल उपजिलाधिकारी न्यायालय द्वारा पीड़िता की याचिका स्वीकार करते हुए बिष्णु गार्डन स्थित मकान नम्बर 19 के टद्बद्भद्ध तल पर रहने तथा भरण-पोषण के लिए दस हजार प्रति माह देने के निणर्य भी दिया,बताया जाता है कि शुरू मेें तीन माह तो दस दस हजार दिया गया, लेकिन बाद मेेड्ड वह भी बंद कर दिया। अभी गत दिनोड्ड विीद्मवा महेन्द्र कौर कनखल थाना पहुची और पुलिस को उपजिलाधिकारी न्यायालय का आदेश दिखाते हुए मकान में दाखिल करने की गुहार लगायी,पुलिस पहले तो मामले को पारिवारिक बताकर टालने का प्रयास किया,लेकिन पीड़िता के साथ आये लोगों का दबाव बनद्मने पर महेन्द्र कौर को लेकर मकान के टपरी तल पर पहुड्डची,लेकिन कमरे में कोई भी सामान नही होने पर बिफर गयी और फिर रहने में असुविधा को देखते हुए फिलहाल अपनी बेटी के पास पहुची है। 

क्या हम सच में उस युग में आ गए हैं, जहां माता-पिता के त्याग और प्रेम की कोई कीमत नहीं बची? यह वही देश है जहां माता-पिता को देवताओं के समान पूजा जाता था, लेकिन अब हम इतने पत्थरदिल हो गए हैं कि हमें उनके दर्द का अहसास भी नहीं होता? यह कहानी सिर्फ महेंद्र कौर की नहीं, बल्कि हर उस मां की है, जिसने अपने बच्चों को अपना सर्वस्व दिया और बदले में अपमान और आंसू पाए। ष्ठया हम अब भी चुप रहेंगे, या इस कलयुगी अन्याय के खिलाफ साथ खड़े होंगे? वहीड्ड दूसरी ओर पीड़िता के बेटे यिंक कुमार ने माँ के द्वारा लगाए जा रहे आरोप को गलत बताते हुए कहा कि वे अपनी मर्जी से अपनी बेटी के पास गई हैं अपने कमरे में खुद अपना ताला लगाकर गई हैं। हालांकि सवाल यह जरूर उठता है कि बिना बात के कोई भी माँ ष्ठयोड्ड अपने बच्च पर झूठे आरोप लगा सकती है। ज्ञात हुआ है कि प्रियंक के ससुर शशि चैहान तंत्रा-मंत्रा में सि(ि किए हुए हैं और उन्होंने प्रियंक को अपने वश में कर रखा है। हालत यह है कि न केवल शशि चैहान बल्कि उनकी पत्नी सपना चैहान एवं भाई आदित्य चैहान भी प्रियंक के घर में डेरा जमाये हुए हैं। शशि चैहान ने अपने दामाद प्रियंक को कुछ इस तरह वश में किया हुआ है कि इन्डेन गेस एजेंसी;हरिद्वार गैस एजेंसीद्ध का मैनेजर बना बैठा है। अगर ये चैहान है तो प्रियंक की पत्नी अपने नाम के साथ गहलोत क्यों लगाती है जबकि उसका पति प्रियंक तो अनुसूचित जाति ‘जाटव’ में आता है। कहते है कि शशि झीवर जाति को बिलोंग करता है जो तालाब में सिंघाडे बोने या मछली मारने का काम करते है। जाटव बिरादरी में शादी करने पर उसे अपने पति की जाति ‘जाटव’ लिखनी चाहिए न कि गहलोत। चैहान व गहलोत दो अलग-अलग जातियां हैं।
अगर आप प्रियंक को देखेंगे तो आपको पता लग जायेगा कि वह नीम बेहोशी में है और किसी के वश में है।

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