हरिद्वार। गुरुकुल कांगड़ी (समविश्वविद्यालय), के दर्शनशास्त्र विभाग में आर्य समाज के प्रखर विद्वान और महान दार्शनिक पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी की जयंती के अवसर पर परिचर्चा का आयोजन किया गया।इस परिचर्चा का मुख्य विषय पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व रहा,जिसमें वक्ताओं ने पंडित जी के अल्पायु जीवन में किए गए महान कार्यों और उनकी विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा पर प्रकाश डाला।कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए डॉ. बबलू वेदालंकारने परिचर्चा की भूमिका रखी।उन्होंने कहा कि पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी का जीवन शोध और सत्य की खोज का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।उन्होंने पंडित जी के बौद्धिक साहस को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे एक प्रखर वैज्ञानिक मस्तिष्क ने वैदिक दर्शन को आत्मसात किया।संचालक ने गुरुदत्त जी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर चर्चा करते हुए कहा, ष्पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी का मानना था कि वेद केवल उपासना की पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि वे ईश्वरीय ज्ञान और विज्ञान का वह अक्षय कोष हैं, जिसे समझने के लिए केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि प्रखर तर्कशक्ति की भी आवश्यकता है।डॉ.भारत वेदालंकार ने पंडित जी के जीवन संघर्षों और महर्षि दयानन्द के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन महर्षि दयानन्द की शिक्षाओं ने पंडित जी के जीवन को एक नई दिशा दी और उन्हें वैदिक दर्शन का पुरोधा बना दिया।डॉ. विपिन बालियान ने संस्कृत और शोध के महत्व पर जोर देते हुए पंडित जी के विचारों को साझा किया कि संस्कृत भाषा के गहन अध्ययन के बिना हम अपने प्राचीन गौरव को कभी पूर्णतः नहीं समझ सकते। उन्होंने कहा कि पंडित जी का शोध कार्य आज भी आधुनिक विद्वानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। डॉ.आशीष कुमार ने कहा कि एक सच्चा दार्शनिक वही है जो रूढ़ियों को त्याग कर सत्य की कसौटी पर हर विचार को परखने का साहस रखता हो, और पण्डित जी ने अपने छोटे से जीवनकाल में यही कर दिखाया।इस बौद्धिक विमर्श में शोध छात्रों के रूप में हिमांशु मिश्रा, धर्मवीर शर्मा और विकास ने भी अपने विचार व्यक्त किए। विभाग के स्नातक एवं परास्नातक के छात्रों ने इस चर्चा में सक्रिय भागीदारी की और पण्डित गुरुदत्त जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

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